गुरुवार, १२ जानेवारी, २०१७

"जवान सरहदपे खडे है।"


उन्हें खबर नहीं आज
उनके तोते किस दिशामें उडे है,
कलतक जो दुहाई देते फिरते थे,
"जवान सरहदपे खडे है।"

आज एक सिपाहीने जो मुंह खोला है,
धरती सहित इनका सिंहासन डोला है।
"वह नादान सिपाही दिमागी मरीज है!"
अपनी सफाईमें वे यह बोल पडे है।
कलतक जो दुहाई देते फिरते थे,
"जवान सरहदपे खडे है।"

वे जो सिपाहियोंकी मिसाल देते नहीं थकते थे,
उनसे यह छोटीसी दरख्वाहिश है।
अपने पंचपक्वान त्याग कर, अबसे रोज वैसीही दाल बनानी है,
वही जली कटीसी रोटी देशहितमें चबानी है।
कहनेको तो चारो ओर देशभक्त बडे है।
कलतक जो दुहाई देते फिरते थे,
"जवान सरहदपे खडे है।"

-विनायक

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