रविवार, २ नोव्हेंबर, २०१४

मंजिले अभी और भी है....

मंजिले अभी और भी है,
यहाँ आकर ख़त्म रहगुजर नहीं होती
चलो, कहीं और चला जाये साथी,
जिंदगी एक जगह बसर नहीं होती।

ना आरजू थी हमें जिंदगीसे कुछ पाने की,
न कोई ख्वाब था ।
बिन मांगेही दामन भरती है जिंदगी,
और हमें खबर नही होती।

किसी नेक बंदेने माँगी होगी
हमारी बरकत तुझे ए खुदा,
सुना है तुझसे जो दुआ माँगी,
कभी बेअसर नहीं होती।

राह चलना तो
मुकद्दर है मुसाफिर का
चलते रहो, कारवां हो न हो
हमराह की कमीसे कसर नहीं होती।

-विनायक

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