मंगळवार, ३० सप्टेंबर, २०१४

डायरी....

एक बार फिर पुरानी डायरी खोल कर देख लो ..
हलका हलकासा सब याद आ जायेगा..
फटे-पुराने पन्नोंमें बीता हुआ कल नजर आयेगा।
गहरी- हलकी उडती हुयी स्याही बीते लम्होंकी दास्ताँ कहेगी
कभी होटोंपर हँसी, कभी आंखोंमे आँसू देकर
जिंदगीके पिछले पलोंका हिसाब चुकता करेगी।

इन लाईनोंकी लिखावटोमें हो सके तो खुदको ढूंढ़ लेना तुम..
ना हंसी को रोकना, ना आँसुओको समेट लेना तुम
ये वो अनमोल चाबी है, जो अतीतका दरवाजा खोल देती है।
ये वो कीमती यादें है जो रुबरुं होकर कर बोल देती है।

बस खुशकिस्मतोंकोही बीती जिंदगी फिरसे जिनेका मौका मिलता है।
ये याँदोका खजाना और कहाँ जिंदा मिलता है?
ये तो बस डायरी है, के जो तुम्हारे अतीत का पासपोर्ट बनके ले जाती है।
वर्ना बीती हुयी जिंदगी फिर कभी हाथ नहीं आती है।

-विनायक

कोणत्याही टिप्पण्‍या नाहीत:

टिप्पणी पोस्ट करा