मंगळवार, ३ सप्टेंबर, २०१३

भारत एक स्वतंत्र देश है, उसमे हर एक को जो चाहे बोलने और करने का स्वातंत्र्य है| कोई प्रदर्शन करे, आंदोलन करे या जिस किसी प्रकारसे उसका मत प्रदर्शित करना चाहें, इसकी उसे पुरी तरह से अनुमती है| बशर्ते ये आंदोलन शांतीपूर्ण और अहिंसा के मार्ग से हो|

पर हर एक व्यक्तीसेभी उपर इस देशकी सार्वभौमिकता और न्यायव्यवस्था है | किसीके कितनेभी उत्तेजित होनेसे, चिल्लानेसे सत्य की परीक्षा नही की जा सकती| सत्यको अपने आप चलकर इस कसौटी पर खरा उतरना होगा| इसलिये जरुरी है के जो आरोप लगे है, हमे उन आरोपोन्की सत्यासत्यता की परीक्षण करने की और अगर कोई दोषी है तो उसे शिक्षा देनेकी जिम्मेदारी देश की कानून व्यवस्थापर पुरी श्रद्धा के साथ सौपनी होगी| और उसमे हर तरीके की संभव सहायता करनी होगी| किसी के निर्दोष होने, या न होनेका प्रशस्तीपत्रक देनेका न तो किसीको अधिकार है, नाही जरुरत|

इस देश की जनता जहा धर्म का नाम सुनती है, वहा अपनी पुरी उर्जा के साथ उठ खडी हो जाती है| पर यही उर्जा किसी और विषय मे नजर नही आती| जब चीजोंके दाम बढते है, या कोई सरकारी घोटाला निकलता है तब इसके दस प्रतीशत उर्जासेभी कोई आंदोलन नही करता| या कही उसके विरोध मे खडा होनेकी जुर्रत नही दिखाता| जब की ये विषय उन सभी लोगोंसे ज्यादा संबंध रखते है नाकी किसी स्वघोषित धर्मगुरु पर लगे हुये लांछन| भारत की जनता की इसी कमजोर नस को पकडकर देश मे राजनीती की जाती है | देश मे अगर सबसे ज्यादा विरोध प्रदर्शन करने की जरुरत है, तो वो देश की गिरती अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और भ्रष्टाचार को लेकर है| पर दुर्भाग्य ये है के ये समझने की हमारे देश की जनता मे न तो काबिलीयत है, और न आस्था |

-विनायक कांबळे

कोणत्याही टिप्पण्‍या नाहीत:

टिप्पणी पोस्ट करा